हरिद्वार। हरिद्वार की ग्राम पंचायत श्यामपुर में ग्राम समाज की भूमि पर अनधिकृत कब्जे को लेकर प्रशासनिक गलियारों और स्थानीय स्तर पर तीखे सवाल उठने शुरू हो गए हैं। मुख्य मार्ग से श्यामपुर श्मशान घाट की ओर जाने वाली सड़क से सटी ग्राम सभा की बेशकीमती भूमि को लेकर यह पूरा विवाद गहराया हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्ध नागरिकों का आरोप है कि ग्राम प्रधान और कथित भूमाफियाओं की साठगांठ के चलते ग्राम सभा की संपत्ति को हड़पने और उसे निजी लाभ के लिए बेचने की कोशिशें की जा रही हैं।
सामुदायिक हित बनाम निजी स्वार्थ: क्या है पूरा मामला?
पंचायती राज और प्रशासनिक नियमों के तहत ग्राम सभा की भूमि को ग्रामीणों की सार्वजनिक व सांझा संपत्ति माना जाता है। ऐसी भूमि का उपयोग नियमानुसार केवल सार्वजनिक, सामुदायिक और विकास कार्यों के लिए ही किया जा सकता है। हालांकि, श्यामपुर में सामने आए इस प्रकरण ने न केवल भूमाफियाओं के दुस्साहस को उजागर किया है, बल्कि ग्राम समाज की भूमि की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस सार्वजनिक जमीन की निगरानी और सुरक्षा का जिम्मा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर है, उनकी सरपरस्ती में ही इस प्रकार की अनियमितताएं सामने आ रही हैं।
राजस्व रिकॉर्ड और धरातल की स्थिति का मिलान जरूरी
मामले की निष्पक्षता और वास्तविकता तक पहुंचने के लिए राजस्व विभाग की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले भूमि का खसरा संख्या, कागजी क्षेत्रफल तथा मौके पर उसकी वास्तविक स्थिति की जांच होना अनिवार्य है। राजस्व विभाग की टीम द्वारा धरातल पर जाकर भूमि का सीमांकन और पैमाइश की जानी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सीमाओं में कोई बदलाव किया गया है या नहीं। इसके साथ ही, यह भी जांच का विषय है कि क्या नियमों के विरुद्ध कोई निर्माण या तारबंदी की गई है और क्या किसी फर्जी दस्तावेज या अनुमति का दावा किया जा रहा है।
जनप्रतिनिधि और प्रशासन की कार्यशैली पर खड़े होते सवाल
जनप्रतिनिधियों का प्राथमिक दायित्व सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा में प्रशासन का सहयोग करना होता है। लेकिन श्यामपुर के इस मामले में आरोप सीधे तौर पर ग्राम प्रधान की भूमिका पर लग रहे हैं। यदि जनप्रतिनिधि ही भूमाफियाओं के साथ मिलकर ग्राम समाज की जमीन को कब्जाने में भागीदार बनते हैं, तो यह सीधे तौर पर जनविश्वास का हनन है। दूसरी ओर, संबंधित राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है। यदि ग्रामीणों व शिकायतों के माध्यम से अधिकारियों तक मामला पहुंचा है, तो अब तक मौके का स्थलीय निरीक्षण और पैमाइश कराकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई?
पारदर्शी जांच और कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग
ग्राम सभा की भूमि किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं है। इस प्रकार के मामलों में केवल कागजी खानापूर्ति से समाधान संभव नहीं है। स्थानीय निवासियों ने मांग की है कि श्मशान घाट मार्ग के किनारे स्थित भूमि का तुरंत पारदर्शी सीमांकन कराया जाए। यदि जांच में किसी भी प्रकार का अनधिकृत कब्जा पाया जाता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से हटाकर भूमि को ग्राम सभा के सुपुर्द किया जाए और इसमें शामिल भूमाफियाओं व जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
क्या सुरक्षित रहेगी ग्राम समाज की जमीन?
श्यामपुर के इस चर्चित प्रकरण पर अब लपूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासनिक रुख पर टिकी हैं। सवाल यही है कि क्या संबंधित विभाग मामले की गंभीरता को देखते हुए समयबद्ध जांच पूरी करेगा या फिर प्रक्रिया को लंबा खींचकर भूमाफियाओं को अवसर दिया जाएगा? इस पूरे विवाद का सत्य केवल और केवल राजस्व विभाग की निष्पक्ष स्थलीय जांच और सरकारी रिकॉर्ड्स के सार्वजनिक होने से ही सामने आ सकता है।



