
सिद्धार्थनगर । इटवा नवजात शिशु की मौत के मामले से जुड़े जनता सेवा हॉस्पिटल की सील खोले जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। अस्पताल पर पहले से नियमों के उल्लंघन के आरोप, मेडिकल काउंसिल से संबंधित कानून समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी और जांच आख्या में कथित अनियमितताओं का उल्लेख होने के बावजूद सील खोलने के निर्णय ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय दोहरे के कथित बयान—“एप्लीकेशन आया था तो खोल दिया”—के बाद शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है और इस प्रकरण में संबंधित अधिकारियों को न्यायालय के समक्ष जवाब देना पड़ सकता हैशिकायतकर्ता का कहना है कि अस्पताल के संबंध में पहले से हुई जांच में नियमों और कानूनों के उल्लंघन की बातें दर्ज की गई थीं।
ऐसे में उन तथ्यों पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित किए बिना अस्पताल की सील खोलने का निर्णय किस आधार पर लिया गया, यह सबसे बड़ा सवाल है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, वह इस मामले को आगे न्यायालय के समक्ष उठाएंगे और सील खोलने के निर्णय से जुड़े सभी संबंधित लोगों की जवाबदेही तय कराने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाएंगेशिकायतकर्ता का दोटूक बयान—अभी मामला खत्म नहीं हुआ, कोर्ट में देना होगा जवाबशिकायतकर्ता ने कहा कि जनता सेवा हॉस्पिटल की सील खोले जाने का प्रकरण अभी समाप्त नहीं हुआ है। उनका कहना है कि जब अस्पताल के संबंध में पहले से जांच आख्या तैयार हुई थी और उसमें कथित तौर पर नियमों के उल्लंघन का उल्लेख था,
तो उसके बाद सील खोलने का निर्णय लेने से पहले उन तथ्यों पर विचार करना जरूरी थाशिकायतकर्ता के अनुसार, वह न्यायालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष और उपलब्ध साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे।
उनका कहना है कि सील खोलने के निर्णय से जुड़े अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों को भी अदालत में अपने निर्णय का आधार स्पष्ट करना पड़ सकता है
।उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अस्पताल के संबंध में पहले से अनियमितताएं दर्ज थीं, तो क्या यह सुनिश्चित किया गया कि उन कमियों को दूर कर दिया गया है?
क्या दोबारा निरीक्षण हुआ?
क्या संबंधित जांच आख्या पर कार्रवाई की गई?
क्या अस्पताल के पंजीकरण और संचालन की वैधता की पुष्टि की गई?
इन सवालों का जवाब संबंधित अभिलेखों से ही मिल सकता हैशिकायतकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य मामले में निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार जवाबदेही तय कराना है।
किसी अधिकारी या अस्पताल प्रबंधन की दोषसिद्धि का निर्णय न्यायालय और सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
जांच आख्या में जब अनियमितताएं दर्ज थीं, तो सील खोलने का आधार क्या बना?
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह जांच आख्या बताई जा रही है, जिसमें शिकायतकर्ता के अनुसार अस्पताल की ओर से नियमों और कानूनों के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है। यदि जांच आख्या में वास्तव में ऐसी अनियमितताएं दर्ज हैं,
तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन पर स्वास्थ्य विभाग ने क्या कार्रवाई की और सील खोलने से पहले किन तथ्यों का सत्यापन कियाक्या अस्पताल संचालक ने सभी कमियों को दूर करने के दस्तावेज प्रस्तुत किए थे?
क्या विभागीय अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच की थी? क्या पूर्व जांच में दर्ज आपत्तियों का निस्तारण किया गया था?
क्या सील खोलने के आदेश में इन तथ्यों का उल्लेख है?यदि जांच आख्या में दर्ज कमियों का निस्तारण किए बिना सील खोली गई, तो यह विभागीय निर्णय की समीक्षा का गंभीर आधार बन सकता है।
वहीं, यदि कमियों को दूर करने के बाद नियमानुसार अनुमति दी गई थी,
तो स्वास्थ्य विभाग को संबंधित रिपोर्ट और आदेश सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिएसवाल केवल सील खोलने का नहीं,
बल्कि यह है कि पहले दर्ज अनियमितताओं पर क्या कार्रवाई हुई और सील खोलने से पहले उनकी जांच किसने की?
सीएमओ का कथित बयान—“एप्लीकेशन आया था तो खोल दिया”मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय दोहरे का कथित बयान इस मामले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
शिकायतकर्ता का सवाल है कि क्या किसी अस्पताल की सील खोलने के लिए आवेदन मिलना ही पर्याप्त है,
या आवेदन पर निर्णय लेने से पहले कानून, पंजीकरण की स्थिति, पूर्व जांच आख्या और सीलिंग आदेश की शर्तों की समीक्षा भी आवश्यक है?
स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आवेदन किस तारीख को प्राप्त हुआ, उस पर किस अधिकारी ने परीक्षण किया, क्या कोई निरीक्षण कराया गया और सील खोलने का लिखित आदेश किस आधार पर जारी किया गयायदि संबंधित अधिकारी ने सभी वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद निर्णय लिया है, तो आदेश और जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकता है।
लेकिन यदि आवश्यक शर्तों की पुष्टि किए बिना निर्णय लिया गया, तो मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठना स्वाभाविक हैलोक सेवा गारंटी अधिनियम के उल्लंघन का आरोपशिकायतकर्ता ने अस्पताल की सील खोलने की प्रक्रिया को लोक सेवा गारंटी अधिनियम के उल्लंघन से भी जोड़ा है।
उनका कहना है कि जब सरकारी अधिकारियों को निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार काम करना होता है, तो किसी अस्पताल के संबंध में निर्णय लेते समय भी कानून और विभागीय प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए हालांकि,
लोक सेवा गारंटी अधिनियम के उल्लंघन का कानूनी निष्कर्ष निकालने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किस अधिसूचित सेवा, निर्धारित समय-सीमा या वैधानिक दायित्व का उल्लंघन हुआकेवल सील खोलने का आदेश जारी होना अपने-आप इस अधिनियम का उल्लंघन साबित नहीं करताइसलिए शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप की जांच संबंधित आदेशों और लागू प्रावधानों के आधार पर की जानी चाहिए
शिकायतकर्ता की मांग है कि पूरे प्रकरण में निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच हो और यदि किसी अधिकारी ने अपने वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएमेडिकल काउंसिल से संबंधित मुकदमे के बीच अस्पताल की स्थिति स्पष्ट करे विभाग जनता सेवा हॉस्पिटल के संबंध में मेडिकल काउंसिल से जुड़े कानून समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की बात कही जा रही है।
इस संदर्भ में भी स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि एफआईआर में वास्तव में कौन-कौन सी धाराएं दर्ज हैं, किन व्यक्तियों को नामजद किया गया है और अस्पताल के पंजीकरण की वर्तमान स्थिति क्या हैयह कानूनी रूप से जरूरी है कि चिकित्सक के व्यक्तिगत पंजीकरण और अस्पताल के संस्थागत पंजीकरण को अलग-अलग देखा जाए।
मुकदमा दर्ज होने मात्र से अस्पताल का पंजीकरण स्वतः निरस्त नहीं हो जाता। लेकिन यदि अस्पताल के संचालन पर कोई वैधानिक रोक, निलंबन या अन्य प्रतिबंध लागू था,
तो सील खोलने के आदेश की वैधता और उसके प्रभाव की जांच आवश्यक होगीइसलिए सीलिंग आदेश, सील खोलने का आदेश, एफआईआर और संबंधित पंजीकरण दस्तावेजों की समीक्षा इस मामले में महत्वपूर्ण हैनवजात शिशु की मौत के मामले में भी जवाबदेही जरूरीअस्पताल से जुड़े नवजात शिशु की मौत के मामले में शिकायतकर्ता और संबंधित अधिकारियों के बीच उठे सवालों का जवाब जांच के माध्यम से सामने आना चाहिए।
यदि उपचार में लापरवाही, चिकित्सकीय मानकों के उल्लंघन या अन्य किसी अनियमितता का आरोप है, तो उसका निर्धारण उपलब्ध साक्ष्य, चिकित्सा अभिलेखों और सक्षम जांच के आधार पर होना चाहिएअस्पताल की सील खोलने का निर्णय और मौत से संबंधित मामले की जांच अलग-अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं।
फिर भी, दोनों के संबंध में पारदर्शिता और नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग को यह भी बताना चाहिए कि अस्पताल को दोबारा खोलने के बाद उसके संचालन पर निगरानी के लिए क्या
व्यवस्था की गई हैसात सवालों के जवाब का इंतजारजांच आख्या में अस्पताल के संबंध में किन अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था?
क्या उन अनियमितताओं को दूर करने का सत्यापन किया गया?सील खोलने का लिखित आदेश किस अधिकारी ने और किस वैधानिक आधार पर जारी किया?
क्या सील खोलने से पहले नया निरीक्षण कराया गया था?अस्पताल का पंजीकरण और संचालन की अनुमति वर्तमान में किस स्थिति में है?लोक सेवा गारंटी अधिनियम के उल्लंघन का शिकायतकर्ता का आरोप किन विशिष्ट प्रावधानों पर आधारित है?
क्या उच्चाधिकारी पूरे मामले की स्वतंत्र समीक्षा कराकर जिम्मेदारी निर्धारित करेंगे?
शिकायतकर्ता ने न्यायालय में पक्ष रखने की बात कही शिकायतकर्ता का कहना है कि वह उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय में अपना पक्ष रखेंगे उनके अनुसार, अस्पताल की सील खोलने के निर्णय से जुड़े सभी पहलुओं की जांच होनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित व्यक्तियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए फिलहाल, इस प्रकरण में सील खोलने के आदेश, जांच आख्या और अस्पताल के पंजीकरण संबंधी दस्तावेजों का सामने आना बेहद महत्वपूर्ण है।
सीएमओ कार्यालय और अस्पताल प्रबंधन का विस्तृत पक्ष भी सामने आने पर मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट होगीअब सबसे बड़ा सवाल
यही है—जब शिकायतकर्ता के अनुसार जांच आख्या में पहले से अनियमितताएं दर्ज थीं, तो उन तथ्यों का निस्तारण किए बिना सील खोलने का निर्णय कैसे लिया गया?
शिकायतकर्ता ने साफ संकेत दिया है कि वह मामले को न्यायालय तक ले जाएंगेअब संबंधित अधिकारियों के निर्णय का आधार और पूरी प्रक्रिया दस्तावेजों के जरिए स्पष्ट होना जरूरी है।



